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भावातीत ध्यान-अनेक समस्याओं का समाधान...

‘‘महर्षि महेश योगी प्रणीत भावातीत ध्यान का नियमित अभ्यास व्यक्ति और समाज की अनेकानेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। भावातीत ध्यान की प्रक्रिया अत्यन्त सरल, सहज, स्वाभाविक और प्रयासरहित है। इसे किसी भी धर्म, आस्था, विश्वास, विचारधारा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, जाति, लिंग के व्यक्ति एक बार सीखकर जीवनभर अभ्यास कर सकते हैं। भावातीत ध्यान आराम से कहीं भी बैठकर किया जा सकता है। ध्यान की यह विधि वेद एवं विज्ञान दोनों से प्रमाणित है। विश्व भर में 700 से अधिक वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा प्रमाणित यह एक मात्र ध्यान की पद्धति है जिसे 100 से भी अधिक देशों के नागरिकों ने सीखा है और चेतना की उच्च अवस्थाओं का अनुभव करके अनेकानेक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इसका व्यक्तिगत अभ्यास व्यक्ति व उसके परिवार के लिये और समूह में अभ्यास पूरे समाज के लिये लाभ दायक है’’ यह विचार ब्रह्मचारी गिरीश जी ने अपने सम्बोधन में व्यक्ति किये।


ब्रह्मचारी जी ने आगे कहा कि ‘‘भावातीत ध्यान के लाभ अनेक हैं। भावातीत ध्यान के नियमित अभ्यास से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्णता आती है, बुद्धि तीक्ष्ण और समझदारी गहरी होती है, बहुमुखी समग्र चिन्तन करने की शक्ति बढ़ती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, दुर्बलता उत्तेजना और चिड़चिड़ापन दूर होता है, भावनात्मक संतुलन बढ़ता है, तंत्रिका-तंत्र को गहन विश्राम मिलने के कारण तनाव तथा थकावट दूर होती है, स्नायु मण्डल की शुद्धि होती है, साधक ‘स्व’ - अपनी आत्मा में स्थित होकर पूर्ण स्वस्थ हो जाता है, बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है जिससे व्यक्ति बीमार नहीं होता, धूम्रपान व मादक पदार्थों के नशे की आदत धीरे-धीरे स्वयं ही छूट जाती है, सहनशीलता बढ़ती है, सहयोग की भावना बढ़ती है, सहिष्णुता बढ़ती है, तनाव चिन्ताएं थकावट दूर रहते हैं, शारीरिक व मानसिक क्षमताओं का पूर्ण जागरण और विकास होता है, आपराधिक प्रवृत्तियाँ और नकारात्मकता का शमन होता है, सुख शाँति और असीम आनन्द की प्राप्ति होती है।’’ उल्लेखनीय है समस्त विश्व में भावातीत ध्यान को अनेक समस्याओं के एक समाधन के रूप में मान्यता मिली हुई है। भावातीत ध्यान को पाश्चात्य जगत में तनाव दूर करने वाली प्रमुख और सर्वाधिक प्रचलित ध्यान पद्धति के रूप में जाना जाता है। तनाव के कारण होने वाले अनेक रोगों जैसे मधुमेह, रक्तचाप, अनिद्रा, हृदय रोग आदि में लाभ के लिये बड़ी संख्या में मेडीकल डाॅक्टरस् भावातीत ध्यान की अनुशंसा करते हैं। अपराध कम करने और कारागारों में बंदियों के उत्थान और पुनर्वास के लिये न्यायाधीश भावातीत ध्यान की अनुशंसा करते हैं। हाल ही में एक शोध ने प्रमाणित किया है कि भावातीत ध्यान के अभ्यासकर्ताओं की आयु में वृद्धि होती है।


भावातीत ध्यान का प्रत्येक साधक अपने जीवन को धन्य मानता है। भावातीत ध्यान परम पूज्य महर्षि महेश योगी का सम्पूर्ण मानवता को एक अनुपम उपहार है।


प्राकृतिक आपदाओं का कारण - प्रकृति के नियमों का उल्लंघन...

"प्रकृति के नियमों का पालन न होकर उनका सामूहिक उल्लंघन ही प्राकृतिक असंतुलन और आपदाओं का कारण है। विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय वर्तमान की शिक्षा में प्रकृति के नियमों का कोई पाठ और प्रयोग नहीं है। व्यक्ति अज्ञान और अनेकानेक कामनाओं की पूर्ति न होने के कारण तनाव और चिंताग्रस्त होता है। व्यक्तिगत तनाव सामाजिक स्तर पर एक बड़े तनाव का गठन करते हैं और ये सामूहिक तनाव बड़े स्तर पर प्राकृतिक आपदा लाते हैं। इसमें बाढ़, सूखा, भूकम्प, बीमारियाँ, दुर्घटनायें आदि सम्मिलित हैं। एक व्यक्ति द्वारा अपराध कारित किये जाने पर राष्ट्रीय विधान उसे दण्ड देते हैं। कुछ व्यक्तियों द्वारा मिलकर अपराध किये जाने पर अधिक गंभीर दण्ड का प्रावधान है। इसी तरह प्रकृति उसके नियमों के सामूहिक उल्लंघन करने पर आपदाओं के रूप में सामूहिक दण्ड देती है।" यह विचार ब्रह्मलीन महर्षि महेश योगी जी के परम प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने व्यक्त किये।


ब्रह्मचारी गिरीश जी ने आगे कहा कि "आज की शिक्षा विदेशों से ली गई शिक्षा प्रणाली है। इसमें कहीं भी मानवीयता का, भारतीय शाश्वत वैदिक ज्ञान - विज्ञान का समावेश अब तक नहीं किया गया है। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात अनेक सरकारों में विदेशों से शिक्षा प्राप्त राजनेता थे जिन्हें भारतीय ज्ञान और शिक्षा का अनुभव नहीं था। अतः जो शिक्षा उन्होंने ली थी उसी को श्रेष्ठ समझकर स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली बना दी। स्वतंत्र भारत में शिक्षा की नींव ही गलत पड़ गई जिसका दुष्परिणाम भारत आज तक भोग रहा है।"


एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने प्रश्न पूछा कि "हजारों लाखों वर्ष पूर्व ज्ञान देने वाले ऋषि, महर्षि क्या पी.एचडी. या एम.बी.ए. थे? जो ज्ञान उस समय दिया गया वह आज भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उतना ही प्रासांगिक है जितना तब था। उसी वैदिक ज्ञान के कारण भारत प्रतिभारत, जगतगुरु भारत था। हम आज भी अपने राष्ट्र को सर्वोच्च शक्तिशाली, ज्ञानवान बना सकते हैं बशर्ते हम शिक्षा के सभी विषयों और स्तरों पर भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान को सम्मिलित कर दें।"


ब्रह्मचारी गिरीश जी ने यह भी पूछा कि "आज की आधुनिक शिक्षा प्राप्त करके कोई ऋषि या ब्रह्मर्षि क्यों नहीं होते? सभी शिक्षाविद् इस तर्क से सहमत हैं किन्तु दुर्भाग्यवश कोई इस दिशा में आगे नहीं बढ़ता। सब किसी और के आगे बढ़ने की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। सभी को आगे आना होगा और भारतीय ज्ञान-विज्ञान परक शिक्षा को वर्तमान शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित करने के लिये आवाज उठानी होगी।" उल्लेखनीय है कि परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने सारे विश्व में हजारों शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की जिनमें चेतना पर आधारित शिक्षा, चेतना विज्ञान और वेद विज्ञान की शिक्षा प्रदान की जाती है। भारत वर्ष में महर्षि जी ने महर्षि विद्या मन्दिर विद्यालयों की श्रृंखला, इन्स्टीट्यूट्स, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना की है।


संतों और श्रेष्ठजनों के विचारों और सुझावों के क्रियान्वयन की महती आवश्यकता...

ब्रह्मचारी गिरीश जी ने कहा है कि ‘‘भारतभर में शिक्षा, ज्ञान, वेद सम्बन्धित अनेकों विचार संगोष्ठियों, सभाओं आदि का आयोजन होता है। सभी आयोजक बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं। देश विदेश से पधारे अनेक विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, समाजसेवी, साधु-संत, राजनेताओं की उपस्थिति और उनके द्वारा व्यक्त विचारों में कुछ अत्यन्त प्रायोगिक और उपयोगी सुझाव होते हैं किन्तु उन जनोपयोगी, जीवनोपयोगी विचारों और सुझावों को लागूकरने की दिशा में कोई कार्य नहीं होता।"


हाल ही में आयोजित एक सभा में उन्होंने एक वक्ता का संदर्भ लेते हुए कहा कि ‘‘यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने विचार होते हैं। सद्विचारों के कारण व्यक्ति एक अच्छा व्यक्ति और कुविचारों के कारण एक दूसरा व्यक्ति बुरा व्यक्ति बनता है।" उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि वर्तमान में कोई भी विद्वान विचारों के स्रोत-भावातीत चेतना को जगाने की बात नहीं करते। चेतना ही जीवन का आधार है, समस्त विचारों की उत्पत्ति-अच्छे या बुरे विचार चेतना के स्तर-चेतना की शुद्धता पर ही निर्भर हैं। यदि बाल्यकाल से अष्टांग योग साधन और भावातीत ध्यान के माध्यम से चेतना को जागृत कर लिया जाये, शुद्ध कर लिया जाये, पवित्र कर लें तो उसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति-विचार, वाणी, व्यवहार और कर्म सभी केवल सात्विक, शुद्ध, सकारात्मक होंगे। आज सबसे बड़ी आवश्यकता है अनुभवी श्रेष्ठजनों, संतों के सुझावों को जीवन संचालन में सम्मिलित करना। यदि हम जीवनपरक सिद्धाँतों और तकनीकों को जीवन दैनन्दिनी में सम्मिलित कर लें तो प्रत्येक व्यक्ति का जीवन धन्य होगा, दिव्य होगा।"


ब्रह्मचारी श्री गिरीश ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि “गाँव-गाँव में टायलेट बनाकर उसका उपयोग भूसा-चारा रखने के लिये करने का उदाहरण इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि केवल भौतिक सुविधायें निर्मित कर देने से समाज या वातावरण में स्वच्छता नहीं आ जायेगी। आध्यात्मिक विकास, चेतना जगाना प्राथमिक आवश्यकता है। एक किसी विशेष कार्य के प्रति चेतना जगाना आधा-अधूरा कार्य है। समग्रता में चेतना की जागृति और विकास करना पड़ेगा, जिससे जीवन के समस्त क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति हो जाये। एकहि साधे सब सधे-आत्मा को जगालो, बस किसी को कुछ नहीं करना पड़ेगा। उपनिषद् में कहा है आत्मावारेदृष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निध्ध्यिासितव्यः। यह बहुत सरल है। भावातीत ध्यान के नियमित अभ्यास से चेतना की पूर्ण जागृति सम्भव है और तब जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सकारात्मक होगा, जीवन सफल होगा। मध्यप्रदेश प्रान्त सर्वोत्कृष्ट प्रान्त बने यह पूर्णतः सम्भव है। प्रदेश की सामूहिक चेतना से यह पता लगेगा कि इस उपलब्धि में कितना समय लगेगा। सरकार की इसमें रूचि से और दृढ़ निश्चय होने से ही यह सम्भव होगा।”


उन्होंने कहा महर्षि संस्थान के पास ज्ञान है, तकनीक है और अपने स्तर पर हम चेतना जगाने का कार्य कर भी रहे हैं, यदि भारत की केन्द्र एवं राज्यों की सरकारें थोड़ा सहयोग करें तो शीघ्र परिणाम आयेगा। ब्रह्मचारी गिरीश जी ने बताया कि परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने वैदिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर जीवन जीने की कला सहज रूप में उपलब्ध करा दी है। सभी को इसका लाभ लेना चाहिये।


सबकुछ वैदिक ही है...

वेद से तात्पर्य ज्ञान से है वैदिक मार्ग से तात्पर्य उस मार्ग से है जो ज्ञान-पूर्ण ज्ञान-शुद्ध ज्ञान प्राकृतिक विधान के पूर्ण सामर्थ्य पर आधारित है यह सृष्टि एवं प्रशासन का मुख्य आधार है जो सृष्टि की अनन्त विविधताओं को पूर्ण सुव्यवस्था के साथ शासित करता है इसीलिये वेद को सृष्टि का संविधान भी कहा गया है । प्राकृतिक विधान की यह आंतरिक बुद्धिमत्ता व्यक्तिगत स्तर पर मानव शरीरिकी की संरचना एवं कार्यप्रणाली का आधार है एवं वृहत स्तर पर यह ब्रह्माण्डीय संरचना सृष्टि का आधार है । जैसी मानव शारीरिकी है वैसी ही सृष्टि है ।


‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे


प्रत्येक व्यक्ति के शरीर के अन्दर विद्यमान इस आंतरिक बुद्धिमत्ता को इसकी पूर्ण संगठन शक्ति को प्रदर्शित करने एवं मानव जीवन एवं व्यवहार को प्राकृतिक विधानों की ऊर्ध्वगामी दिशा में विकास करने के लिए पूर्णतया जीवंत किया जा सकता है ऐसा करने से कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक विधानों का उल्लंघन नहीं करेगा एवं कोई भी व्यक्ति उसके स्वयं के लिए अथवा समाज में किसी अन्य व्यक्ति के लिए दुःख का आधार सृजित नहीं करेगा। जब हम वैदिक प्रक्रियाओं द्वारा बुद्धिमत्ता को जीवंत करते हैं, तो हम उसके साथ ही जीवन के तीनों क्षेत्रों-आध्यात्मिक चेतना का भावातीत स्तर आधिदैविक चेतना का बौद्धिक एवं मानसिक स्तर एवं आधिभौतिक वह चेतना जो भौतिक शरीर भौतिक सृष्टि को संचालित करती है को एक साथ जीवंत करते हैं । प्राकृतिक विधान की पूर्णता ही प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा है। यह अव्यक्त एवं भावातीत है क्योंकि उस स्तर पर इसमें चेतना की समस्त संभावनायें जाग्रत रहती हैं यही चेतना की पूर्ण आत्मपरक अवस्था-आत्मनिष्ठता वस्तुनिष्ठता एवं उनके संबंधों के समस्त मूल्यों की एकीकृत अवस्था होती है ।


ब्रह्मचारी गिरीश जी ने विद्वानों से बातचीत में इस गूढ़ वैदिक ज्ञान का रहस्योघाटन किया। ब्रह्मचारी जी ने कहा सब कुछ वैदिक ही है अर्थात् सब कुछ ज्ञान से ही निर्मित है। जो वेद विरोधी ज्ञान विरोधी भारतीयता विरोधी हैं उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि उनका अपना शरीर उसके आधार में स्थित चेतना और उनकी प्रत्येक श्वास भी वैदिक है ज्ञानमय है। मानव जीवन के समस्त क्षेत्रों को पूर्ण बनाने अधिक प्रभावी एवं उपयोगी बनाने के लिए इनमें वैदिक ज्ञान का समावेश करने की आवश्यकता है। ये क्षेत्र हैं शिक्षा स्वास्थ्य कृषि पर्यावरण एवं वन शासन सुरक्षा प्रशासन प्रबंधन अर्थव्यवस्था वित्त मानव संसाधन विकास विधि एवं न्याय व्यवसाय एवं वाणिज्य व्यापार एवं उद्योग संस्कृति वास्तुकला पुनर्वास राजनीति धर्म कला एवं संस्कृति संचार सूचना एवं प्रसारण विदेश नीति विज्ञान एवं तकनीकी युवा कल्याण समाज कल्याण प्राकृतिक संसाधन ग्राम विकास महिला एवं बाल कल्याण और अन्य। वैदिक सिद्धांत एवं प्रयोग जीवन के इन क्षेत्रों को परिपूर्ण एवं सशक्त करेंगे एवं सत्व का अमिट प्रभाव राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक

रेशे में प्रवेश कर राष्ट्रीय चेतना का नवीन जागरण करेगा शुद्धता उदित होगी एवं भारत अधिक सुदृढ़ एवं तेजस्वी होगा । भारतीय प्रशासकों का व्यक्तिगत अहम् राष्ट्रीय अहम् तक ऊपर उठेगा राष्ट्रीय अहम् वैश्विक अहम् तक ऊपर उठा देगा वे प्राकृतिक विधान के प्रशासक होंगे प्रत्येक नागरिक के प्रगति मार्ग को समर्थित एवं गौरवान्वित करेंगे एवं भारत में भारतीय प्रशासन को सृजित करेंगे। व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैदिक सिद्धांतों एवं प्रयोगों के समावेश से भारत में आश्चर्यजनक उपलब्धियां होंगी ।


कलियुग में भी रामराज्य स्थापित हो सकता है...

ब्रह्मलीन परम पूज्य महर्षि महेश योगी के परम प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने वैदिक पण्डितों को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘‘इस कलियुग में भी रामराज्य की स्थापना हो सकती है। महर्षि जी ने कुछ वर्ष पूर्व ही विश्वव्यापी रामराज्य स्थापित करने की घोषणा कर दी थी और भारत के भौगोलिक केन्द्र-भारत के ब्रह्मस्थान में इस रामराज्य की वैश्विक राजधानी स्थापित की थी। रामराज्य की स्थापना का आधार आदर्श व्यक्ति, आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र का निर्माण है। जब प्रबुद्ध नागरिकों, अजेय व शाँतिपूर्ण राष्ट्रों का निर्माण होगा तभी धरा पर रामराज्य की पुनः स्थापना होगी-भूतल पर स्वर्ग का अवतरण होगा, जहां प्रत्येक व्यक्ति के लिये सबकुछ उत्तम होगा, किसी भी व्यक्ति के लिये कुछ भी अनुत्तम नहीं होगा "।


ब्रह्मचारी गिरीश ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘‘जब हम रामराज्य की बात करते हैं तो अधिकतर व्यक्ति यह सोचते हैं कि इसका केवल धर्म से ही सम्बन्ध है। वास्तव में रामराज्य, जीवन व्यवस्था का एक उच्च स्तरीय वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसे कोई भी व्यक्ति अपना सकता है, किसी भी धर्म की भावनाओं एवं बंधन को छोड़े बिना ही। श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकाण्ड में रामराज्य का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। ऐसा रामराज्य वर्तमान समय में भी स्थापित करना वैदिक विज्ञान और उसके प्रयोगों को अपनाकर पूर्णतः सम्भव है।


“रामराज्य के वर्णन में बताया गया है कि प्रजा के सारे शोक संताप मिट गये, परस्पर भेद, राग, द्वे श मिट गये, चारों आश्रमों और वर्णों के लोग वेद अर्थात् ज्ञान मार्ग पर चलकर धर्म परायण हो गये, शोक भय रोग मिट गये, दैहिक, दैविक और भौतिक ताप मिट गये, पापों का शमन हो गया, निर्धनता समाप्त हो गई, अकाल मृत्यु की घटनायें समाप्त हो गईं, संघर्ष और दुःख मिट गया, प्रजा परोपकारी परस्पर सौहार्दता वाली हो गई, काम क्रोध मोह जैसे विकारों का अन्त हो गया, पशु-पक्षी आपस में वैर भुलाकर साथ रहने लगे, ऋतुयें समय पर आने लगीं, बाढ़ सूखा आदि प्राकृतिक आपदाओं का निवारण हुआ, नगर सुन्दर हो गये, लतायें पुष्प मधु टपकाने लगे, गौयें मनचाहा दूध देने लगीं, बादल मनचाही जल वृष्टि करने लग गये। यह सब आज भी संभव है। इसमें न कहीं किसी धर्म विशेष की बात है और न ही राजनीति की। "


उन्होंने कहा कि ‘‘वर्तमान में जिस तरह श्रीरामजी और रामराज्य का मुद्दा विवादित बना दिया गया हैं, उससे न रामजी प्रसन्न होने वाले हैं, न रामराज्य की स्थापना होने वाली है। जब भक्त अपनी शुद्ध चेतना और आत्मा के स्तर पर श्रीराम को इष्ट बनाकर उनकी अविरल निष्काम निर्विकार भक्ति में लीन होंगे और श्रीरामजी द्वारा स्थापित मर्यादा का पालन करेंगे तो रामराज्य की स्थापना होगी और जनमानस सुखी होगा। आज की आवश्यकता है कि रामराज्य के आदर्शों को शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर अध्यापित कराया जाये, उनके गुण, चरित्र, आदर्श, सिद्धाँत और प्रयोगों से नई पीढ़ी को अवगत कराया जाये, रामचरित मानस केवल एक ग्रन्थ सारी सामाजिक नकारात्मकताओं को हटाकर पूर्ण सकारात्मकता का उदय कर सकता है सारी समस्याओं का हल दे सकता है।“


उन्होंने सेकुलर शब्द की त्रुटिपूर्ण व्याख्या और सरकारों का उसमें अटक जाने को लेकर कहा कि सेकुलर तो केवल प्रकृति है जो किसी से भी भेदभाव किये बिना समभाव बनाये रखती है, बाकी सब सेकुलर शब्द का दुरुपयोग अपने-अपने ढंग से अपने निहित स्वार्थों के लिये करते हैं। राम मन्दिर निर्माण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि ‘‘हर रामभक्त अपने इष्ट का मन्दिर चाहता है, मन्दिर तो बनना ही चाहिए पर उससे पहले मन मन्दिर में राम को बसाना होगा। जब तक हृदयों में-अव्यक्त के क्षेत्र में श्रीराम नहीं बसेंगे, तब तक श्रीराम व्यक्त रूप में-भौतिक रूप से स्थापित नहीं होंगे।"

ब्रह्मचारी गिरीश ने सम्बोधन के अंत में कहा कि “महर्षि जी ने हम सबको दोनों तरह का ज्ञान; शाश्वत् वैदिक ज्ञान और अत्याधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान, जो दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं, उपहार में दिया है। हमारी तैयारी पूरी है। हमारे पास इस ब्रह्माण्डीय प्रशासकीय बुद्धिमत्ता का पर्याप्त ज्ञान है, जिसे हम समाज, नगर, प्रान्त एवं राष्ट्र की सामूहिक चेतना में इसके सुव्यवस्थित, विकासात्मक प्रभाव को शांत भाव से समावेशित करने के लिए प्रयोग में ला सकते हैं एवं इसके द्वारा जीवन के प्रत्येक स्तर पर गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं, रामराज्य की स्थापना कर सकते हैं।" गिरीश जी ने वैदिक पण्डितों से कहा कि आप सब वैदिक ज्ञान-विज्ञान के अधिष्ठाता हैं, आप अपने दायित्व को ईमानदारी से निभायें, सारे विश्वा परिवार का कल्याण होगा।


महर्षि संस्थान सम्पूर्ण भारत में महर्षि वेद पीठों की स्थापना करेगा...

महर्षि संस्थान के पदाधिकारियों की बैठक में परम पूज्य महर्षि महेश योगी के प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने उद्घोषणा की कि “आगे आने वाले समय में पहले भारत के प्रत्येक जिले में और फिर विकास खण्डों में महर्षि वेद पीठ की स्थापना की जायेगी। इन पीठों में वैदिक वांगमय के सभी विषयों का सैद्धाँतिक और प्रायोगिक ज्ञान हर नागरिक को अत्यन्त सरलता से एवं शुद्धता से उपलब्ध कराया जायेगा। वैदिक वांगमय में सुखी जीवन के लिये विभिन्न क्षेत्रों के सिद्धाँत व प्रयोग दिये गये हैं, इसका उपयोग मनुष्य को हर दृष्टि से सुखी बना सकता है।"


ब्रह्मचारी गिरीश जी ने बतलाया कि ‘‘परम पूज्य महर्षि महेश योगी ज्योतिष्पीठोद्धारक ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज बद्रिकाश्रम हिमालय के शिष्य थे और उन्होंने सम्पूर्ण विश्व में अपने गुरुदेव के आशीर्वाद से वैदिक ज्ञान विज्ञान का प्रचार-प्रसार करके भारत का सम्मान बढ़ाया। महर्षि जी ने स्वयं को कभी गुरू नहीं कहा न अपनी पूजा करवाई, केवल अपने गुरुदेव की ही पूजा करवाकर जय गुरु देव का उद्घोष करते हुए सारा कार्य किया। आजकल तो अपने आप को गुरू, भगवान और न जाने क्या-क्या कहलवाने और अपनी पूजा करवाने की होड़ सी लगी है। भारत की ये वैदिक पीठ श्री गुरुदेव की कृपा और महर्षि जी के आशीर्वाद से स्थापित होंगी और उनकी ही ज्ञान परम्परा का पालन करेंगी।’’


वैदिक ज्ञान की सबको आवश्यकता है। भारतवर्ष में सैकड़ों संस्थान वेद-विज्ञान के प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन में अपना-अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। महर्षि संस्थान भारतवर्ष के समान उद्देश्यों वाले संस्थान को साथ लेकर विस्तृत योजना बनाकर इसका क्रियान्वयन करेगा। सर्वे भवन्तु सुखिनः ही इस योजना का परम उद्देश्य होगा। महर्षि वेद पीठों में सैद्धांतिक अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ योगाभ्यास, प्राणायाम, भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम, योगिक उड़ान जैसे साधना के कार्यक्रम भी आयोजित किये जायें। इसके अतिरिक्त जीवन को वैदिक उपायों से सुखी, समृद्ध, स्वस्थ, सुरक्षित, प्रबुद्ध तथा अजेय बनाने के लिये परामर्श भी दिया जायेगा।


यज्ञ की प्रक्रिया अत्यन्त शुद्ध और विधान निश्चित हैं यज्ञ विधान में अशुद्धि और प्रक्रिया में त्रुटियाँ विनाशकारक हैं...

गुरूदेव ब्रह्मानन्द सरस्वती आश्रम, भोपाल में वैदिक यज्ञाचार्यों से चर्चा के दौरान परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी के प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने यज्ञों में शुद्धता पर बहुत जोर डाला। उन्होंने बताया कि ‘‘वैदिक ग्रन्थों में वर्णित वैदिक विधानों और प्रक्रियाओं के अनुसार ही यज्ञों का संपादन किया जाना चाहिए। विधान के उल्लंघन और जरा सी असावधानी, अशुद्धता या त्रुटि यजमान और यज्ञाचार्य के लिये विनाशकारी सिद्ध हो सकती है।’’


उन्होंने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘हमने अनेक यज्ञों में स्थापित यज्ञ मण्डपों का भ्रमण करके देखा कि कुछ यज्ञ मण्डप विधान पूर्वक नहीं बनते हैं, हवन कुण्डों का आकार शास्त्रोक्त नहीं होता, सड़क चलता कोई भी व्यक्ति बैठकर हवन करने लग जाता है जिसे विधान की कोई जानकारी नहीं है, शुद्धि के ऊपर ध्यान नहीं दिया जाता। यज्ञ कराने वाले पंडित या आचार्यों का वेदोच्चारण अशुद्ध होता है, स्वर ठीक नहीं होता है, सामग्री अशुद्ध होती है, सामग्री सड़क पर पड़ी होती है जिस पर पशु बैठे होते हैं। हम किसी को भोज के लिये आमंत्रित करें और शुद्ध स्वादिष्ट भोजन पकवान के स्थान पर अशुद्ध या सड़ा हुआ


दुर्गन्धयुक्त भोजन परोसें तो एक साधारण व्यक्ति भी अपशब्द कहता हुआ भोजन छोड़कर चला जायेगा। इसी तरह हम देवताओं को आमंत्रित करें और उन्हें समिधा में यूरिया और अन्य विशैले उर्वरकों या कीटनाशक युक्त शर्करा, जौ, तिल, घृत आदि सामग्री से हवन करें तो असीमित शक्ति के धनी देवता निश्चित रूप से कुपित होकर यज्ञकर्ता को दण्डित करेंगे और चले जायेंगे। यज्ञ का नकारात्मक हानिकारक फल होगा।’’


ब्रह्मचारी गिरीश ने यज्ञ आयोजकों से करबद्ध विनम्र अनुरोध किया कि वे केवल सिद्धहस्त, योग्य यज्ञ विशेषज्ञों द्वारा ही यज्ञ का संपादन करायें। यदि उनके पास विशेषज्ञ न हों तो पहले उन्हें योग्य आचार्यों से प्रशिक्षित करा लें। यदि सहायता की आवश्यकता हो तो महर्षि वेद विज्ञान विश्व विद्यापीठम् प्रशिक्षण कराने को तैयार है। ब्रह्मचारी गिरीश ने यह भी बताया कि महर्षि विद्यापीठ के ब्रह्मस्थान, करौंदी, सिहोरा परिसर में 1331 वैदिक पंडितों द्वारा एक पाठात्मक अतिरुद्र महायज्ञ नित्य संपादित हो रहा है। साथ ही भोपाल परिसर में अब तक 5 लक्षचण्डी महायज्ञ पूर्ण हो चुके हैं और छठवाँ चल रहा है। महर्षि महेश योगी जी ने अनेक वर्षों तक भारत के श्रेष्ठतम और योग्य


यज्ञाचार्यों और वैदिक विद्वानों के साथ सलाह करके लगभग 300 लुप्तप्राय यज्ञ विधानों को पुनःजाग्रत किया और वैदिक पंडितों का प्रशिक्षण किया। गौरतलब है कि महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठम् ट्रस्ट अब तक लगभग 60,000 वैदिक विद्वानों, कर्मकाड विशेषज्ञों, याज्ञिकों का प्रशिक्षण करा चुका है जो सम्पूर्ण विश्व में फैले हुए हैं और विशुद्ध वैदिक तरीके से यज्ञानुष्ठान आदि सम्पादित करते व कराते हैं।


सत्यमेवजयते बहुत महत्वपूर्ण सिद्धाँत...

परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी के प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने आज कहा कि ‘‘सत्यमेवजयते" एक बहुत बड़ा, महत्वपूर्ण और मूल्यवान सिद्धाँत है। जो मनुष्य अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या सत्य पर आधारित रखेंगे उन्हें सदा विजय की प्राप्ति होगी, पराजय कभी नहीं देखनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि वैदिक वांगमय सत्य सम्बन्धी गाथाओं और उनके शुभफलों से भरा पड़ा है।


‘‘इस काल में हमने महर्षि महेश योगी जी को सत्य के पर्याय रूप में देखा। 50 वर्षों तक शताधिक देशों में अनेकानेक बार भ्रमण करके समस्त धर्मो, आस्था, विश्वास, परम्परा, जीवन शैली के नागरिकों को भारतीय वेद विज्ञान का जीवनपरक ज्ञान देना, भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम, योगिक उड़ान, ज्योतिष, गंधर्ववेद, स्वास्थ्य, वास्तुविज्ञान, कृषि, पर्यावरण, पुनर्वास आदि विषयों का सैद्धाँतिक ज्ञान और प्रायोगिक तकनीक देना किसी एक व्यक्ति के लिये असम्भव है। जब महर्षि जी विश्व को दुःख से, संघर्ष से मुक्त करने निकले थे, तब आज की तरह ईमेल, मोबाइल, इंटरनेट, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, संचार, शोसल नेटवर्क इतना सुलभ नहीं था। सारा कार्य चिट्ठी-पत्री से होता था। गुरुदेव तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी ने हिमालय बद्रिकाश्रम की गद्दी 165 वर्ष तक रिक्त रहने के पश्चात् 1941 में सम्हाली थी और अपने, गहरे पूर्ण वैदिक ज्ञान, तप, परिश्रम से पूरे भारतवर्ष विशेषरूप से उत्तर भारत में अध्यात्म और धर्म की पताका घर-घर में फहरा दी। बड़ी संख्या में विशाल यज्ञों का आयोजन किया। गुरुदेव के कार्यों के आधार में उनका ज्ञान, तप और प्रमुखतः सत्व था। ‘‘पूज्य महर्षि जी ने 13 वर्ष श्रीगुरुदेव के श्रीचरणों की सेवा करते हुए साधना की और ज्ञान व सत्य के मार्ग को अपनाकर सारे विश्व में जो भारतीय ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन और कार्य योजनाओं का क्रियान्वयन किया वह अद्वितीय है, न भूतो न भविष्यति।


ब्रह्मचारी गिरीश ने कुछ निराशा जताते हुए कहा कि ‘‘इस कलिकाल में मानव जीवन से सत्व का ह्रास होने के कारण तनाव, परेशानियाँ, दुःख, संघर्ष, आतंक, चिन्तायें, रोग-बीमारी आदि तेजी से मानव जीवन को जकड़ रही हैं। हम किसी की आलोचना या निन्दा नहीं करना चाहते किन्तु सत्य तो यह है कि आज अध्यात्म या धर्म की जाग्रति के प्रचार के स्थान पर व्यक्ति केन्द्रित प्रचार अधिक हो रहा है। यदि समस्त धर्म गुरु अपने-अपने शिष्यों को नित्य साधना के क्रम से जोड़ दें तो भारतवर्ष की सामूहिक चेतना में सतोगुण की अभूतपूर्व अभिवृद्धि होगी और सत्यमेवजयते पुनः स्थापित होने लगेगा।"


गिरीश जी ने यह भी कहा कि ‘‘आज धर्मगुरुओं के उत्तराधिकार को लेकर मठों, अखाड़ों, पीठों, संस्थाओं में वैचारिक, वैधानिक मतभेद के साथ-साथ मारपीट और साधु संतों के बीच खून-खराबे तक के समाचर पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। हमें यह समझ नहीं आता कि सन्यास ले लेने वाले किसी पद या सम्पत्ति या गद्दी के या प्रतिष्ठा के लिये क्यों लड़ते हैं? यह अपनी वैदिक परम्परा के विरुद्ध है। यह प्रमाणित करता है कि उनका सन्यास वास्तविक नहीं है। भगवा वस्त्र धारण कर, साधु वेष बना लेना केवल दिखावा है। सन्यासी तो मन से होना चाहिये। आत्मचेतना से सन्यासी हों और यह सब व्यक्ति के स्वयं की शुद्ध सात्विक चेतना पर निर्भर होता है। साधना की कमी सतोगुण में कमी रखती है, रजोगुण और तमोगुण हावी हो जाते हैं तब सन्यासी अपने कर्तव्य से विमुख होकर साधारण मनुष्य की तरह आचरण करने लगते हैं, धर्म गुरु का केवल नाम रह जाता है और सत्व दूर रह जाता है। संत कबीरदासजी ने ठीक ही कहा है मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा।"


ब्रह्मचारी गिरीश ने कहा कि वे सन्तों, साधुओं, सन्यासियों और धर्म गुरुओं के श्रीचरणों में दण्डवत प्रणाम करते हैं और उनसे निवेदन करते हैं कि वे अपने शिष्यों, भक्तों को सत्यमेव जयते की विद्या प्रदान कर भारतीय और विश्व परिवार के नागरिकों का जीवन धन्य करें और सत्य पर आधारित अजेयता का उपहार आशीर्वाद में दें। भारत और विश्व सदा भारतीय साधकों और धर्म गुरुओं का ऋणी और कृतज्ञ रहेगा।


भारत सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र है...

"भारत अभी भी सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र है। भारत वेद भूमि-पूर्णभूमि-देवभूमि प्रतिभारत भारत है। यहाँ रामराज स्थापित रहा है, जहाँ भूतल पर स्वर्ग का अनुभव नागरिक कर चुके हैं। भारत के शाश्वत् सनातन सर्वोच्च वैदिक ज्ञान जीवन संचालन के समस्त नियमों, विधानों, प्रक्रियाओं से भरपूर हैं। व्यक्ति का जीवन समष्टि के ज्ञान और विज्ञान पर आधारित है। दूसरी तरफ ‘‘यथापिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" इसकी पुष्टि कर देता है कि व्यक्ति और समष्टि दोनों एक से ही हैं। एक लघुरूप हैं दूसरा वृहद् रूप। भारत ही देवताओं का घर है। यहीं आवश्यकतानुसार धर्म स्थापना हेतु देवता मानव या अन्य शरीर धारण करके पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।


भारत ही प्रत्येक मानव मात्र में ईश्वर का अंश देखता है। भारत ही व्यक्ति को सर्वसमर्थ ओजस्वी तेजस्वी चेतनावान, ऊर्जावान, सृजनशील, बुद्धिमत्ता से पूर्ण देखता है। भारत ही ऋद्धि-सिद्धियों से तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से भरा है और इनका उपयोग करके विश्व परिवार को सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य, आनन्द, प्रबुद्धता, शाँन्ति, अजेयता प्रदान करना चाहता है। भारत अन्य बलशाली राष्ट्रों की तरह विध्वंसकारी आयुधों के बल पर महान नहीं है, यह अपनी सहृदयता, मानवीय सांस्कृतिक सिद्धाँतों, सहिष्णुता और मूल्यों के कारण महान है। भारत विश्व का पथ प्रदर्शक रहा है, अभिभावक की भूमिका, जगद्गुरू की भूमिका में रहा है। भारत के ज्ञानी, ऋषि-मुनि ही विश्व के समस्त देशों में जाकर वहां के नागरिकों को आध्यात्मिक और आधिदैविक ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देते रहे हैं।


एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरेन पृथित्यां सर्व मानवाः ।।


वेदों का ज्ञान और उसके जीवन पोषणकारी प्रयोग केवल भारत के पास हैं। आधुनिक भौतिक विज्ञान वेद विज्ञान से अबतक बहुत पीछे है। आधुनिक विज्ञान भारतीय वेद विज्ञान की पूर्णता के आगे बौना है। भारत का ज्ञान प्रकृति के नियमों-सृष्टि के संविधान से पोषित है। प्रकृति की सत्ता सर्वशक्तिमान है और इसका सहयोग भारत को है। इसीलिये भारत आज भी सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र है। दुर्भाग्य का विषय यह है कि भारतीय नेतृत्व स्वतंत्रता के बाद से ही विदेशी दासता के अपने संस्कारों से ग्रसित रहा है और भारतीय ज्ञान-विज्ञान का सहारा न लेकर भारतीय प्रजा के जीवन में समस्त क्षेत्रों में विदेशी पाश्चात्य सिद्धाँतों और प्रयोग को लगा दिया। परिणामस्वरूप पाश्चात्य सभ्यता के दुर्गण भारत में कानूनन आ गये। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण, पुनर्वास, व्यापार, वाणिज्य, नगर विन्यास व योजना आदि सभी क्षेत्र पाश्चात्य सिद्धाँतों की केवल प्रतिलिपि होकर रह गये। भारत सर्वोच्च शक्तिशाली आज भी है इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। भारतीय नेतृत्व ने पाश्चात्य सभ्यता का चश्मा लगा लिया था जिसके रहते उन्हें सब कुछ भारत के बाहर का तो नजर आया किन्तु अपने घर की विद्या, उसकी महानता, पूर्णता और मानवहितकारी प्रभाव उन्हें दिखे ही नहीं है। परिणाम स्पष्ट है, भारत सर्वोच्च शक्तिशाली ज्ञानवान होते हुए भी शक्तिशाली राष्ट्रों के पीछे-पीछे घूमता फिरता है। छोटे-छोटे दुर्बल राष्ट्र भी उसे आँखे दिखाते हैं। ज्ञान, विद्या, पूर्णता की अनदेखी और उपेक्षा का यह भयावह परिणाम है।


भारत सरकार और प्रान्तीय नेतृत्व को चाहिये कि वो भारतीय ज्ञान-विज्ञान को कानून बनाकर जीवन के हर क्षेत्र में समावेशित करें और फिर देखें कि कैसे भारत विश्व नेतृत्व कर सकेगा, सारे विश्व के लिये भाग्य विधाता बनेगा, जगद्गुरु की गरिमा पुनः स्थापित होगी और सारे विश्व भारतीय ज्ञान स्तम्भ के प्रकाश में प्रकाशित होगा।’ उक्त विचार परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी के प्रिय तपोनिष्ठ शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी ने महर्षि संस्थान से जुड़े श्रद्धालुओं के समूह को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये।


ब्रह्मचारी ने भारत के समस्त नागरिकों का आव्हान करते हुए कहा कि ‘‘भारतीय नागरिक तो सभी धर्म परायण हैं, धर्म का पालन करने वाले हैं, सरकारें धर्म निरपेक्ष हैं, सेकुलर हैं, नागरिक अपने उत्थान के लिये सरकारों द्वारा कुछ किये जाने की प्रतीक्षा न करें। भारत के नागरिक स्वयं अपने और विश्व परिवार के उत्थान में समर्थ हैं। नित्य योगाभ्यास करें, योगस्थ होकर कर्म करें, सदाचार का पालन करें, ध्यान साधना करें, परस्पर मैत्री और सद्भाव रखें, अपने अपने धर्मों का ईमानदारी से पालन करें, गृहशान्ति करायें, देवताओं के सामयिक यज्ञानुष्ठान करें और करायें, यथाशक्ति जरूरतमन्दों की सहायता करें। कुछ समय में ही भारतवर्ष की कीर्ति पताका चहुँओर फैलेगी, सारा विश्व भारतीय ध्वज तले इकट्ठा होगा, भारत सर्वोच्च शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में पुनः मान्य होगा, जगद्गुरु के रूप में अपना दायित्व निभायेगा।’’


चेतना समस्त सम्भावनाओं का क्षेत्र - ज्ञान, शक्ति और आनन्द का अनन्त सागर है...

श्रीमद्भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को देशकाल बन्धन से परे किये गये उपदेश में योगस्थः कुरूकर्माणि, योगः कर्मसुकौशलम्, सहजम् कर्मकौन्तेय, निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन आदि अभिव्यक्तियों से गूढ़ रहस्य उद्घाटित कर दिये हैं। ध्यान देने की बात यह है कि भगवान के उपदेश में बौद्धिक स्तर से कर्म करने की बात नहीं है, योग में-समाधि में-चेतना में-आत्मा में स्थित होकर कर्म करने का मार्गदर्शन है। आज सभी श्रेष्ठजन कर्म करने की चर्चा करते हैं किन्तु यह कर्म केवल सतही स्तर पर रह जाता है, चेतना के स्तर पर नहीं, और यही कारण है कि लगातार कर्म करते हुए भी अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आते। पूर्व काल में जब कोई ऋषि, मुनि, महर्षि आशीर्वाद देते थे तो वह त्वरित प्रभावशाली होता था। आयुष्मानभव, सफल हो, कल्याण हो, सौभाग्यवतीभव आदि आशीर्वाद के वाक्य या क्रोधवश दिये श्राप का प्रभाव निश्चिततः होता ही था। यज्ञ और अनुष्ठानों का फल प्राप्त हो जाता था। अब क्या हो गया? घर-घर में पूजा, पाठ, अनुष्ठान, यज्ञ होते हैं


किन्तु फल की प्राप्ति नहीं होती, क्यों? क्योंकि यह सब आज के भक्तजन या कर्मकाण्डी केवल बौद्धिक स्तर पर, वाणी के वैखरी स्तर पर करते हैं। आवश्यकता वाणी के परा स्तर से अर्थात् परा चेतना से-भावातीत चेतना-तुरीय चेतना-आत्म चेतना के स्तर पर पहुंचकर कर्म करने की है। योग में स्थित होकर कर्म करो अर्थात् वाणी के परा स्तर से कार्य करो अर्थात् भावातीत चेतना-तुरीय चेतना के स्तर से कार्य करो। यह सम्भव है क्या? हाँ, चेतना की जागृत, स्वप्न, सुशुप्ति की तीन अवस्थाओं का नित्य अनुभव करते हुए चेतना को सहज रूप में लाकर-चौथी अवस्था-भावातीत की चेतना-परा की चेतना-शिवम् शान्तम् अद्वैतम् चतुर्थम् मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः में स्थित होकर कर्म करो, तो फिर वहां समस्त देवताओं की उपस्थिति, जागृति होने से सारे विचार, सारे व्यवहार, सारे कर्म सहज होते हैं, सात्विक होते हैं, सकारात्मक होते हैं, सफल होते हैं, प्रकृति के नियमों के अनुरूप होते हैं, प्रकृति पोषित होते हैं, परिणामतः सत्यमेवजयते होता है। भावातीत चेतना-सहज चेतना के स्तर से कार्य होने पर कार्य सहज हो जाते हैं, प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं होता, व्यक्ति अस्वस्थ नहीं होता, वाणी भी पवित्र हो जाती है, प्रिय और सत्य वचन ही बोले जाते हैं, सब कुछ दैवीय सत्ता से पोषित होता है, जीवन के हर क्षेत्र में बस एक ही उद्घोष रह जाता है-विजयन्तेतराम्।


चेतना का क्षेत्र असीमित है, चेतना आत्मपरक है, समस्त सम्भावनाओं का क्षेत्र है, प्रकृति के नियमों का केन्द्र है, विश्व के समस्त देवी-देवताओं का घर है, समस्त गुणों का भण्डार है, ज्ञान का अनन्त भण्डार है, क्रियाशक्ति का श्रोत है, रचनात्मकता का क्षेत्र है, आत्मा का क्रियात्मक रूप है, व्यक्त शरीर का अव्यक्त आधार है। जब भावातीत चेतना में किसी विचार या संकल्प का सूत्र लगाते हैं, स्पन्दित करते हैं तो वह अविलम्ब फलीभूत होता है। यही योग में स्थित होकर कर्म करने का रहस्य है, विधान है जो अत्यन्त सरलता से महर्षि जी ने मानवता को उपलब्ध करा दिया है। अब यदि हम इसे जीवन का अभिन्न अंग बना लें तो दुःख संघर्ष आदि दूर होंगे, जीवन सुखी, समृद्ध, गौरवशाली, सफल और सभी प्रकार से आनन्दमय होगा" ये उद्गार ब्रह्मचारी गिरीश जी ने भोपाल में स्थित गुरुदेव ब्रह्मानन्द सरस्वती आश्रम में श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये।